Wednesday, July 28, 2010

मेरी तीन कविताएं

।।एक।
धूप की चादर ओढ़े
छांव खोज रही थी गौरैया
पेड़ के साये में दुबकी
पंखों में शरीर छुपाए
वह सांसों की हवा में
तपिश को भुलाने लगी
शाम आते आते उसके
चेहरे पर मुस्‍कान आने लगी
होठों पर थी उसके चुप्‍पी
पर अब वह धीरे-धीरे
गुनगुनाने लगी।


।।दो।।
तुमसे छुपा गए हम कई बातें
अपने से कैसे छुपाएं उन्‍हें
*
हिम्‍मत की सच बोलने की
कमजोर पड़ गई जुबान
*
कभी हुआ करता था जो कद बड़ा
अब वह अपने में ही सिमट गया
*
कभी लगता रहा ये सफर अकेला
कभी साथ चलता लगा कारवां
*
कभी लगती जिंदगी थकन
कभी विश्‍वास से भरी पूरी


।।तीन।।
नैया कितनी भी है जर्जर
फिर भी लड़ती रहती लहरों से
सम्‍बल देता विश्‍वास भरा संघर्ष
लगातार बहती रहती साहस से!
0 नीमा

18 comments:

  1. कभी हुआ करता था जो कद बड़ा

    अब वह अपने में ही सिमट गया

    नीमा जी आपका कद सिमटा नहीं बल्कि पहले से भी कहीं ज्यादा बढ़ गया है .....!!


    मुझे उम्मीद है कुछ ही दिनों में आप अपना ब्लॉग खुद चलाने लगेंगी ......!!


    शुभकामनाएं .....!!

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  2. स्वागत है.......... गौरैया की मंद मुस्कान बड़ी प्यारी लगी ..... बस अब पहचान हो गई , मैंने भी यूँ ही शुरुआत की थी, मेरी बेटी ने सब किया , मुझे सिखाया ....

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  3. (राजेश जी नीमा जी के ब्लाग पर कमेन्ट पोस्ट नही हो रहा। आप ये कमेन्ट वहाँ पोस्ट कर दें। धन्यवाद)

    नीमाजी को बहुत बहुत बधाई और स्वागत। नीमा जी आप तो बहुत अच्छा लिखती हैं। इतनी सुन्दर कवितायें मन मे छुपा कर रखने से अच्छा है हमे पढवायें। शुभकामनायें। ** निर्मला कपिला

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  4. दो नंबर जिस कविता पर है। लगता है वो ही नंबर वन है। आशा निराशा का इतना सजीव वर्णन। निंसेदह हम जैसे आम पाठक के लिए सर्वोत्तम। लगा जैसे अपने को ही पढ़ रहे हैं हम।

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  5. एक तो एक नम्बर है. ज़िंदगी की इन मासूम संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए कवि ह्रदय होना जरूरी है. यह निम्बोलियां नहीं, भ्रमर का जुटाया शहद लगता है.
    ..यह भी खूब रही..ब्लागिंग में जिससे खतरा हो उसे ही अपनी पार्टी में मिला लिया.
    ..दोनों को बधाई.

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  6. नीमा जी की रचनाएँ बहुत मौलिक और प्रेरक हैं...तीनो रचनाएँ अद्भुत हैं और उनकी लेखनी का लोहा मनवा रही हैं...नीमा जी का अनुभव और संवेदनशीलता उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई दे रहा है...आपने एक शशक्त लेखिका को ब्लॉग मंच प्रदान कर हम जैसे पाठकों पर उपकार किया है...हम उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं और ...आपका शुक्रिया...

    नीरज

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  7. bahut bahut swagat hai aapka, iss blog ki duniya main.........:)

    aapki rachna ka jabab nahi!!
    inko padh kar hame aapse prerna milegi, kuchh achchhe likhne ke liye..............dhanyawad!!

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  8. कभी लगता रहा ये सफर अकेला
    कभी साथ चलता लगा कारवां
    aur
    नैया कितनी भी है जर्जर
    फिर भी लड़ती रहती लहरों से
    सम्‍बल देता विश्‍वास भरा संघर्ष
    लगातार बहती रहती साहस से!
    Sabse pahle to nirmla ji ka blog jagat mein haardik swagat..
    Sach mein neebon jaisa hara-hara aapka blog dekhkar behad prasanta ho rahi hai..
    Rachnaon ko padhkar laga sach mein aap bahut achha likhti..
    Haardik shubhkamnayne..

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  9. हरकीरत जी,रश्मि जी,
    देवेन्‍द्र जी,रोहित जी,नीरज जी,मुकेश जी और कविता जी आपने आकर मेरा मनोबल बढ़ाया। आभारी हूं।

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  10. Nrmala ji, Kavitayein Bahut aachi hain, Blog ke liye meri shubhkamnayein'.
    Parul

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  11. mam..aapka blog jagat mein bahut bahut swagat hai...tino hi rachnaayen sundar ban padi hai ..iski aapko badhai aur aage ke liye shubhkaamnayen bhi :)

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  12. निर्मला वर्मा जी

    धूप की चादर ओढ़े
    छांव खोज रही थी गौरैया


    शुभारंभ सचमुच स्वागतयोग्य है…
    और प्रथम कमेंट ही नज़्मों की राजकुमारी के रूप में जानी जाने वाली हरकीरत हीर जी का मिलना …
    शगुन बहुत अच्छा हुआ है !

    प्रयास करतीं रहें
    ब्लॉग संसार में आपका स्वागत है …
    शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , आइए…

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  13. निर्मलाजी, बहुत अच्छा लगा आप के ब्लाग पर आकर. अभिव्यक्ति ही जीवन को सुन्दर बनाती है, खुद को दूसरों के साथ बांट्ने का जरिया मुहैया कराती है. यह जारी रहनी चहिये. मेरी शुभकामनाएं.

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  14. निर्मला जी,
    आपका ब्लोगजगत मे स्वागत है।
    आपकी तीनो ही कवितायें ज़िन्दगी का आईना बन गयी हैं। पहली कविता ज़िन्दगी के उल्लास , उमंग और संवेदनशीलता से भरी हुयी है और दूसरी कविता मे ज़िन्दगी के उतार चढाव चित्रित कर दिये हैं और तीसरी कविता हर हाल मे ज़िन्दगी से लड्कर जीने के लिये प्रेरित करती है………………पहली ही पोस्ट आपकी हिट है…………सारी ज़िन्दगी का निचोड एक ही पोस्ट मे दे दिया आपने।

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  15. निर्मला जी,



    आपका बहुत बहुत स्वागत है. आपकी तरह से ही बहुत सी कलमें हैं जो उम्र के उस दौर में सिर्फ लिखती रहीं और बंद करके रखती रहीं. अब समय आ गया है तो उन्हें दस्तावेज बना कर पेश कर रहे हैं.

    बहुत सुन्दर लिखा है अपने. बधाई.

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  16. @ शुक्रिया पारुल द्वय का।
    @ शुक्रिया सुभाष जी।
    @ शुक्रिया राजेन्‍द्र जी।
    @ शुक्रिया रेखा जी।
    @ शुक्रिया वंदना। आप सब का स्‍नेह बना रहेगा तो मैं भी यहां मिलती रहूंगी।

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  17. डा सुभाष रायJuly 31, 2010 at 6:31 AM

    निर्मला जी, इस ब्लाग पर अपनी बात कहने के बाद मैं प्रिय राजेश के न्योते पर उंके ब्लाग पर गया. माफ कीजियेगा, वहां जाकर मैं जान पाया कि आप ही राजेश की नीमा हैं. इससे आप के प्रति आत्मीयता और बढ गयी है.

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  18. नीमा भाभी जी,
    एक साहित्यिक प्रतिभा को चुनौती देने का दुःसाहस मेरे जैसा असाहित्यिक व्यक्ति कर ही नहीं सकता. मैंने सिर्फ एक प्रश्न उछाला था बाबा भारती जी से, और आज उत्तर मिला है. आपके आगमन से ब्लॉग जगत का जो भला हुआ है उसके बाद मैं ‘आपको चुनौती देने’ जैसे दोष को भी सिर माथे लेने को तैयार हूँ.
    आपकी समस्त रचनाएँ भले ही आज आपकी निम्बोली की संगेबुनियाद हो, कल ब्लॉग जगत में मील का पत्थर सबित होगी.
    सलिल

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आप यहां आए शुक्रिया। क्षमा करें,मैं अभी कम्‍प्‍यूटर से बहुत अधिक परिचित नहीं हूं। मैं प्रयत्‍न करूंगी कि आपके ब्‍लाग पर आऊं। पर हो सकता है अभी अपनी टिप्‍पणी दर्ज न कर पाऊं। आप अपनी चुनी हुई निबोलियों के लिए कुछ शब्‍द यहां दर्ज करते जाएं...